01/09/2026
तमिलनाडु सरकार ने मुस्लिम छात्राओं और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए कई बड़ी घोषणाएँ की हैं। सरकार ने सरकारी कोटे के तहत प्रवेश लेने वाली पात्र मुस्लिम छात्राओं की स्नातक स्तर की ट्यूशन फीस पूरी तरह वहन करने की घोषणा की है। यह सुविधा सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और सेल्फ-फाइनेंसिंग संस्थानों में कला, विज्ञान, इंजीनियरिंग, चिकित्सा, कृषि और कानून जैसे पाठ्यक्रमों के लिए लागू होगी। इसके लिए शुरुआती तौर पर ₹20 करोड़ का प्रावधान किया गया है।
इसके अलावा मुस्लिम छात्राओं के लिए कक्षा 9 और 10 की छात्रवृत्ति को बढ़ाकर ₹2,000 वार्षिक किया गया है, जिससे लगभग 41,384 छात्राओं को लाभ मिलने की बात कही गई है। तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के माध्यम से चेन्नई में अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए एक नया आर्ट्स एंड साइंस कॉलेज स्थापित करने की घोषणा भी हुई है, जिसके लिए ₹2.45 करोड़ की शुरुआती सहायता बताई गई है।
इतना ही नहीं, सरकार ने मुस्लिम वक्फ और ईसाई धार्मिक संपत्तियों पर कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, मैरिज हॉल जैसी आय-सृजन वाली संपत्तियां विकसित करने के लिए ₹100 करोड़ का रिवॉल्विंग फंड बनाने की घोषणा की है, जिसके तहत ब्याज-मुक्त ऋण दिए जाने हैं। यानी यह बात अलग है कि सरकार सीधे वक्फ बोर्ड को ₹100 करोड़ देकर उसकी संपत्ति खरीदने या कमर्शियल प्रॉपर्टी बनाने जा रही है; वास्तविक घोषणा आय-सृजन वाली संपत्तियों के विकास के लिए ब्याज-मुक्त ऋण की है।
अब सवाल यह है कि गरीब छात्राओं की शिक्षा में मदद करना अच्छी बात है या नहीं? बिल्कुल अच्छी बात है। बेटियों की शिक्षा के लिए सरकार को हर संभव सहायता देनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि सरकारी सहायता का आधार आर्थिक जरूरत होना चाहिए या धार्मिक पहचान? अगर किसी गरीब हिंदू परिवार की बेटी भी फीस भरने में सक्षम नहीं है, तो उसकी मदद क्यों नहीं? क्या गरीब हिंदू परिवारों के घर नोट छापने की मशीन लगी हुई है? क्या हिंदू लड़कियाँ पढ़ाई की हकदार नहीं हैं? अगर सरकार शिक्षा को लेकर सच में संवेदनशील है तो ऐसी सहायता गरीब और जरूरतमंद छात्राओं के लिए धर्म से ऊपर उठकर क्यों नहीं दी जाती?
अब कुछ लोग कहेंगे कि मुस्लिम समुदाय अल्पसंख्यक है, इसलिए उसके लिए विशेष योजनाएँ बनाई जा रही हैं। ठीक है, लेकिन फिर यही तर्क जम्मू-कश्मीर जैसे उन क्षेत्रों में रहने वाले हिंदुओं पर भी लागू होना चाहिए जहाँ हिंदू स्वयं अल्पसंख्यक हैं। अगर अल्पसंख्यक होने का आधार किसी क्षेत्र में कम संख्या होना है, तो वहाँ हमारी बहनों की शिक्षा के लिए भी वैसी ही विशेष व्यवस्था क्यों नहीं?
भारत में मुस्लिम आबादी करोड़ों में है और देश की आबादी में मुस्लिम समुदाय दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक समुदाय है। इसलिए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर अल्पसंख्यक कल्याण की नीतियों की सीमा और उद्देश्य क्या होने चाहिए।
और अगर सरकार वास्तव में सामाजिक न्याय की बात करती है, तो फिर एक स्पष्ट नीति क्यों नहीं बनती कि एक निश्चित जनसंख्या सीमा पार कर चुके समुदायों के लिए धार्मिक आधार पर विशेष सुविधाओं की समीक्षा की जाए और सहायता का आधार आर्थिक पिछड़ापन, गरीबी और वास्तविक जरूरत बनाया जाए? उदाहरण के तौर पर 5 करोड़ की सीमा जैसी स्पष्ट कसौटी तय करके धार्मिक तुष्टीकरण की राजनीति को समाप्त किया जा सकता है। यह किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि सरकारी योजनाओं में समानता और समान अवसर की मांग है।
मुद्दा यह नहीं है कि मुस्लिम लड़कियों को शिक्षा क्यों दी जा रही है। मुद्दा यह है कि अगर सरकार बेटियों की शिक्षा का खर्च उठा सकती है, तो फिर गरीब हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन या किसी भी अन्य समुदाय की जरूरतमंद बेटी के लिए वही दरवाजा क्यों नहीं खुलना चाहिए? शिक्षा का अधिकार धर्म देखकर नहीं, जरूरत देखकर मिलना चाहिए। यही असली सवाल है।
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