18/09/2026
क्रांति की शुरुआत बेडरूम से होती है...
ऐसा मानने वाला कॉमरेड जब दूसरों को, खासकर जब किसी नाथपंथी बाबा को लम्पट कहता है तो लगता है कि कलियुग चरम पर है।
गुंडा तो खैर बहुत से विपक्षी कहते हैं। कोई नई बात नहीं। माफियाओं को चुन-चुन कर मिट्टी में मिलाने की जुर्रत या तो कोई गुंडा कर सकता है या कोई बावला देशभक्त। देशभक्ति हर किसी के समझ आएगी नहीं, क्योंकि उसके लिए मिट्टी के प्रति कृतज्ञ होना अनिवार्य शर्त है। तो चलो गुंडा ही सही। जाकी रही भावना जैसी..
दंगाई का आरोप भी पहले लग चुका है। क्या है न कि वह गांधीवादियों की तरह आधा श्लोक नहीं पढ़ता , बल्कि पूरा पढ़ता है- "अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च।"
हालाँकि वह हमेशा प्रतिक्रिया में ही ऐसा जायज मानता है न कि सामने आगे बढ़ के, फिर भी किसी की नजर में वह दंगाई है तो दंगाई ही सही।
लेकिन ये जो लम्पट कहा गया है न, वह किस एंगल से लागू हो रहा है भाई? लम्पट का मतलब है व्यभिचारी, कामी। ऐसा व्यक्ति जो अत्यधिक कामवासना के कारण दुराचार करता है।
लम्पट तो न कभी उसके विपक्षी कह सके, न ही इनसे छत्तीस का आंकड़ा रखने वाले माफिया। क्योंकि जिस नाथ परंपरा से वह आते हैं, वहाँ कोई लम्पट टिक ही नहीं सकता।
नाथपंथ प्राचीन, रूढ़िवादी और जेएनयू वालों के शब्दों में कहें तो पिछड़ा हुआ पंथ है जिसका आधार ही हठयोग और ब्रह्मचर्य है।
नाथपंथ और वामपंथ बिल्कुल जुदा हैं। नाथपंथ स्त्रियों को बाधा मानता है जबकि वामपंथ में क्रांति की शुरुआत बेडरूम से होती है।
मुझे लगता है कि 'लम्पट' शब्द का मतलब वह कॉमरेड जानती ही न थी। कैसे जानती, यह शब्द वामपंथ की शब्दावली में है ही नहीं। बल्कि ऐसा कोई कांसेप्ट ही नहीं है, वहाँ इसे 'स्वेच्छाचारिता' कहते हैं। वो कुछ तो कहते हैं- माय बॉडी,माय चॉइस...
आखिरी बात। उस क्रांतिकारी को लगता है कि वैचारिक मतभेद के कारण पिता 10 सालों से उससे बात नहीं करते।
ओ कॉमरेड कन्हैया की डुप्लीकेट, संतान से मतभेद तो हर दूसरे पिता का होता है। इसके कारण कोई थोड़े ही बात करना बंद कर देता।
पता है कोई पिता अपनी पुत्री से इतनी घृणा कब कर सकता है कि बात ही न करे..?
सिर्फ तभी जब उनकी नजरों में पुत्री 'लम्पट ' निकल जाय।
- उज्ज्वल