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06/07/2024

Chhattish gadh ke maati ma ketka khushbu aawathe.....

29/12/2023
26/04/2023

_आत्म मूलक लेख_
पिता जी की स्वतंत्र विचारों की पत्रकारिता करने के कारण हमारे घर की बुनियादों में उनका अधिकतर प्रभाव था अनैतिक आर्थिकता और अनैतिक आचरण का प्रतिरोध उनकी सोच में स्पष्ट झलकता था. ओशो से भी बहुत हद तक प्रभावित पिताजी स्वतंत्र विचारों से लबरेज रहते जबकि ओशो के विचारों में इतनी स्वतंत्रता थी कि समाज ने इसी कारण उनकी जान तक ले ली फिर चाहे वो देशी या विदेशी कोई भी ताकतें रही हों, लेकिन इसी माहौल की मिल्कियत में पनपता मैं अंदर की सच्चाई बरकरार रख खुद का मार्ग दर्शक बना रहा, जब मेरे मित्र दारू खाने में दारू पीते तो मैं दोस्ती निभाने उनके साथ बैठता और साफ्ट ड्रिंक पीकर उनका साथ भी निभा देता फिर चाहे समाज के वरिष्ठ और व्हाइट कॉलर लोग मुझे कुछ भी संज्ञा की दृष्टि से क्यों न नवाजे़ं मेरे अंदर की सच्चाई मेरे दोस्तों का साथ निभाने तक सीमित थी.पर मैंने इन सब को भी जीवन में काम आने वाले अनुभव के तौर पर लिया और समझा कि भारतीय वेशभूषा और संस्कृत के साहित्य से परे भी हर विषय का अपना साहित्य है, फिर चाहे गणित का विषय ही क्यों न हो उसका भी अपना साहित्य है अपना आचरण है, अपनी व्यथा है, खुले बालों में बाइक पर सवार हाफ पैंट पहने सड़क पर इतराते नवयुवक या किशोर आवारा गर्द नहीं बल्कि अपनी प्रकृति अनुसार बढ़ते कदम उन्हें जीवन के किसी न किसी उतार चढ़ाव का प्रायोगिक और उत्कृष्ट कार्य ही सिखाते हैं क्या धोनी के और जान इब्राहिम के बाल बढ़े थे तो वे आवारा गर्द थे अपने अपने क्षेत्र में देश के किसी न किसी छोर का प्रतिनिधित्व ही किया, वर्ल्ड कप जीतने पर तेन्दुलकर का विश्व पटल पर सेंपेन पीना क्या आवारा गर्दी कहें जबकि वो भारत रत्न से नवाज़े गये, होली की लकड़ियों की चोरी करने वाले क्या चोर कहलाएंगे जबकि यह त्यौहार की एक परंपरा मात्र है, बाइक पर अजब गजब पैंतरे दिखाते किशोरों को क्या आप आवारा गर्द कहेंगे बजाय इसके कि वे भविष्य में स्टंटर बनें, बाइकर्स बनें, या फिर पुलिस, फौज या आर्मी के सिपाही बनकर लाल किले में राष्ट्रीय पर्वों में अपनी इन कला बाजियों से देश को सलामी दें.
एक पुस्तक की छोटी सी कहानी याद आती है "दो भाई थे स्कूल में भर्ती किये गए एक भाई अत्यंत उत्साही और हाज़िर जवाबी और दूसरा शांत शून्य सा, एक साबासी का हक़ दार तो एक प्रचंड धूर्त प्रकृति का शांत पर उम्र के बढ़ते चरणों में शांत प्रकृति का बालक कुछ समझने के काबिल हुआ तो खुद को शर्मिंदगी से निकालने के लिए सिर्फ लेबर करने लगा, भविष्य यह हुआ जनाब, विर्लियंट भाई ने तुरंत ही अच्छी खासी संविदा शिक्षक की नौकरी ज्वाइन कर ली और लेबर गिरी करते करते धूर्त बालक संघर्ष रत ही रहा और आई. पी.एस. ही ज्वाइन कर पाया.
ऐसे ढेर उदाहरण मौजूद हैं और यह लेख खूबियाँ या अपनी प्रकृति प्रदर्शित करने को उत्साहित नहीं सोच के आदान प्रदान का एक कारण बनना है कि हो सकता है आपकी प्रकृति जो भी है वैसे ही किसी अन्य की प्रवृत्ति और प्रकृति भी उसकी उतनी है जितनी आपकी.

लेखन- आशु त्रिपाठी.

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