04/01/2026
🐘 गणेश और कार्तिकेय की परिक्रमा कथा (विस्तृत)
एक बार कैलाश पर्वत पर देवताओं की सभा लगी हुई थी। उसी समय देवर्षि नारद वहाँ पहुँचे। उनके हाथ में एक दिव्य फल था, जिसे ज्ञान और अमरत्व का प्रतीक माना जाता था। नारद जी ने वह फल भगवान शिव को दिया और कहा—
“यह फल केवल एक ही संतान को दिया जा सकता है, जो सबसे योग्य हो।”
भगवान शिव और माता पार्वती दुविधा में पड़ गए कि यह फल किसे दिया जाए—
गणेश को, जो बुद्धि और विनम्रता के प्रतीक थे,
या कार्तिकेय को, जो पराक्रम और शौर्य के प्रतीक थे।
तब माता पार्वती ने एक परीक्षा रखने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा—
“जो पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके वापस आएगा, वही इस फल का अधिकारी होगा।”
🚩 कार्तिकेय का मार्ग
कार्तिकेय तुरंत अपने मयूर पर सवार हुए और तेज़ गति से पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े। उन्हें अपने बल, गति और पराक्रम पर पूरा विश्वास था।
🧠 गणेश की बुद्धि
गणेश जी ने सोचा—
“मैं मोटा हूँ, मेरे पास कोई तेज़ वाहन नहीं है। अगर मैं पृथ्वी की परिक्रमा करने गया, तो हार निश्चित है।”
लेकिन गणेश जी बुद्धि के देवता थे। उन्होंने गहराई से विचार किया और फिर मुस्कुराते हुए माता-पिता के पास आए।
उन्होंने पहले भगवान शिव और माता पार्वती को प्रणाम किया और फिर तीन बार उनकी परिक्रमा की।
माता पार्वती ने आश्चर्य से पूछा—
“गणेश, तुम पृथ्वी की परिक्रमा क्यों नहीं कर रहे?”
गणेश जी ने विनम्रता से उत्तर दिया—
“मेरे लिए माता-पिता ही संपूर्ण ब्रह्मांड हैं।
आपकी परिक्रमा करना ही पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के समान है।”
भगवान शिव और माता पार्वती यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने गणेश जी को गले लगाया और वही दिव्य फल उन्हें प्रदान कर दिया।
कुछ समय बाद कार्तिकेय पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करके लौटे, लेकिन तब तक निर्णय हो चुका था। कार्तिकेय को पहले क्षण में दुःख हुआ, पर बाद में उन्हें भी गणेश जी की बुद्धि का सम्मान हुआ।