05/05/2026
महाराष्ट्र की मिट्टी से उपजा 'टुरिंग टॉकीज' (Touring Talkies) का सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। यह सिर्फ सिनेमा नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता उत्सव है। आइए, इसके रोमांच और दर्शकों के उस 'क्रेज' को करीब से देखते हैं:
1. गांव का 'लाल किला' (तंबू का सिनेमा)
जब गांव के खाली मैदान में बड़े-बड़े तंबू (Tent) गाड़ने शुरू होते थे, तो समझो दिवाली आ गई। लाल रंग के इन तंबुओं के अंदर मिट्टी पर बैठकर फिल्में देखना एक अलग ही रोमांच था। आज के मल्टिप्लेक्स की 'रिक्लाइनर' कुर्सियों में वो मजा कहां, जो जमीन पर पालथी मारकर बैठने और अपनों के साथ सीटी बजाने में आता था।
2. ढोल-ताशों के साथ 'फिल्म का विज्ञापन'
टुरिंग टॉकीज की मार्केटिंग का अंदाज सबसे निराला था। एक जीप या बैलगाड़ी पर फिल्म के बड़े-बड़े पोस्टर लगाकर पूरे गांव में घुमाया जाता था। साथ में लाउडस्पीकर पर बजते गाने और हाथ से फेंके जाने वाले रंग-बिरंगे पर्चे (Pamphlets) बच्चों के बीच लूट मचा देते थे। यह शोर ही फिल्म के 'हाउसफुल' होने की गारंटी होता था।
3. प्रोजेक्टर की जादुई रोशनी
सफेद पर्दे पर जब प्रोजेक्टर की तेज रोशनी पड़ती और धूल के कणों के बीच से 'रील' घूमती हुई दिखती, तो दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। फिल्म की रील बीच में टूट जाना या बिजली चले जाना आम बात थी, लेकिन दर्शक नाराज होने के बजाय 'वन्स मोर' के नारे लगाते और ऑपरेटर के फिल्म ठीक करने का बेसब्री से इंतजार करते।
4. जतारा (मेले) की जान
महाराष्ट्र की 'जतारा' (मेला) टुरिंग टॉकीज के बिना अधूरी मानी जाती थी। लोग कोसों दूर से बैलगाड़ियों में खाना बांधकर सिर्फ फिल्म देखने आते थे। फिल्म देखते हुए घर का लाया हुआ 'पिठलं-भाकरी' खाना एक सामूहिक पिकनिक जैसा अहसास देता था।
5. दर्शकों का क्रेज: सीटी, सिक्के और आंसू
* सिक्कों की बारिश: जब पर्दे पर हीरो की एंट्री होती या कोई धमाकेदार गाना आता, तो तंबू में सिक्कों की बारिश हो जाती थी।
* भावुक जुड़ाव: अगर फिल्म दुखद होती, तो पूरा तंबू सुबकियों से भर जाता। दर्शक फिल्म को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि हकीकत मानकर जीते थे।
* मन्नतें: कई बार तो लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर टुरिंग टॉकीज में फिल्म का शो प्रायोजित (Sponsor) करते थे।
6. डिजिटल दौर में भी जिंदा है रूह
आज नेटफ्लिक्स और यूट्यूब के दौर में भी हिंगोली, बुलढाणा, जालना, बीड, यवतमाळ जैसे दूरदराज के इलाकों या बड़े मेलों में टुरिंग टॉकीज अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। हालांकि अब रील की जगह डिजिटल प्रोजेक्टर आ गए हैं, लेकिन उस तंबू की महक और दर्शकों का वो शोर आज भी पुरानी यादों को ताजा कर देता है।
टुरिंग टॉकीज सिर्फ एक पर्दा नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों की 'सपनों की दुनिया' थी, जिनके पास सिनेमा हॉल जाने के पैसे या साधन नहीं थे।
क्या आप जानना चाहेंगे कि महाराष्ट्र के किन प्रमुख मेलों में आज भी टुरिंग टॉकीज का लुत्फ उठाया जा सकता है?
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