04/09/2026
जब उद्धव ने श्रीकृष्ण से पूछा कि द्रौपदी के चीरहरण के समय आप मौन क्यों रहे?
एक बार उद्धव जी ने भगवान श्री कृष्ण से मित्रता, धर्म और कर्म को लेकर एक अत्यंत गंभीर प्रश्न पूछा। यह संवाद आज भी हमारे जीवन को आत्मचिंतन की प्रेरणा देता है।
उद्धव जी ने पूछा कि हे कृष्ण! आप तो अंतर्यामी हैं। आपने ही कहा है कि सच्चा मित्र वही है जो बिना माँगे अपने मित्र की सहायता करे। फिर जब पांडव संकट में थे, तब आपने उन्हें पहले से क्यों नहीं बचाया?
आपने युधिष्ठिर को जुआ खेलने से क्यों नहीं रोका?
आपने पासे को धर्म के पक्ष में क्यों नहीं पलटा?
जब द्रौपदी को भरी सभा में अपमानित किया गया, तब भी आप तत्काल क्यों नहीं आए?
आप तब प्रकट हुए, जब दुशासन उनका चीरहरण करने लगा। इतनी देर क्यों?
भगवान श्री कृष्ण मुस्कुराए और बोले कि उद्धव, विजय उसी की होती है जो समय पर विवेक से काम लेता है।
युधिष्ठिर मुझे अपनी ओर से खेलने के लिए कह सकते थे। यदि शकुनि और मैं पासे खेलते, तो बताओ विजय किसकी होती?
उन्होंने मुझसे प्रार्थना की थी कि जब तक मुझे बुलाया न जाए, मैं सभाकक्ष में प्रवेश न करूँ। उनकी प्रार्थना का सम्मान करते हुए मैं बाहर प्रतीक्षा करता रहा। वे हारते गए, लेकिन मुझे पुकारने के बजाय भाग्य को दोष देते रहे।
उद्धव जी ने पूछा, और द्रौपदी के समय?
श्री कृष्ण बोले कि जब द्रौपदी को सभा में लाया गया, तब तक उसने मुझे नहीं पुकारा। जब उसे अपनी सामर्थ्य और सहारे पर निर्भरता व्यर्थ लगी और उसने पूर्ण विश्वास के साथ मुझे पुकारा, तब मैं उसी क्षण उसकी रक्षा के लिए उपस्थित हुआ।
अब बताओ, मेरी गलती कहाँ थी? उद्धव जी ने फिर पूछा कि क्या आप तभी सहायता करेंगे, जब कोई आपको पुकारे? क्या आप स्वयं आगे नहीं आएँगे? श्री कृष्ण ने कहा कि उद्धव, यह सृष्टि कर्म और कर्मफल के सिद्धांत पर चलती है। मैं प्रत्येक क्षण तुम्हारे साथ हूँ। मैं तुम्हारे कर्मों का साक्षी हूँ और तुम्हें विवेक प्रदान करता हूँ लेकिन तुम्हारे स्थान पर कर्म करने का अधिकार तुम्हें ही है।
उद्धव जी ने मुस्कुराकर कहा, तो क्या मनुष्य पाप करता रहे और आप केवल देखते रहें?
भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि मनुष्य पाप तब करता है, जब वह यह भूल जाता है कि मैं हर क्षण उसके साथ हूँ और उसके कर्मों का साक्षी हूँ। यदि मनुष्य को हर पल मेरी उपस्थिति का अनुभव रहे, तो क्या वह सहज ही अधर्म का मार्ग चुन पाएगा?
ईश्वर को याद रखना केवल पूजा नहीं, बल्कि अपने प्रत्येक कर्म के प्रति जागरूक रहना भी है।
हमारे जीवन में अनेक अवसर ऐसे आते हैं, जब हमें सही और गलत के बीच स्वयं निर्णय लेना होता है। ईश्वर हमें विवेक, चेतना और मार्गदर्शन देते हैं, लेकिन कर्म हमें स्वयं करना होता है।
जब हमें यह अनुभूति हो जाए कि #परमात्मा हर #क्षण हमारे साथ हैं और हमारे प्रत्येक कर्म के साक्षी हैं, तब हमारे भीतर से अधर्म का साहस और पाप की प्रवृत्ति धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है।
🙏 जय श्री राधेकृष्ण 🙏