29/06/2023
छठ में गाँव आया हूँ । घर के लोग मेरी परीक्षा ले रहे थे कि मैं दउरा उठाऊँगा की नहीं। नंगे पाँव चलूँगा कि नहीं। सबको ग़लत साबित कर दिया। कितनी निगाहों और इम्तहानों से मेरी ज़िंदगी गुज़रती है, ख़ुद को उन सबसे मुक्त रखता हूँ लेकिन नंगे पाँव चलकर लोगों की तकलीफ़ को महसूस किया और दउरा उठा कर उस भार को जी लिया जो सबके हिस्से आता है। लोक पर्व में लोक होना पड़ता है। बहुत आनंद आया। आप सभी को छठ की बधाई। मुझे ज़मीन पर रखने के लिए भी शुक्रिया।