29/03/2026
आज शाम लखनऊ सिनेफ़ाइल्स में हमने ट्यूनिशिया की निर्देशक काउथर बेन-हानिया की फ़िल्म ‘द वॉयस ऑफ़ हिन्द रजब’ देखी और उसके बाद फ़िल्म पर और साथ ही फ़िलिस्तीन व इज़रायल के सवाल पर काफ़ी गर्मागर्म और विस्तृत चर्चा हुई।
शुरू में फ़िल्म का परिचय देते हुए सत्यम ने कहा कि यह फ़िल्म पूरी दुनिया में देखी और सराही जा रही है लेकिन हमारे देश के लोग इसे देखने से वंचित हैं क्योंकि मोदी सरकार ने यह कहते हुए इसे थिएटरों में दिखाने की इजाज़त नहीं दी है कि इससे इज़रायल, यानी फ़ादरलैंड के साथ उसके रिश्ते ख़राब हो जायेंगे। यह बेहद हास्यास्पद तर्क है क्योंकि ख़ुद इज़रायल के फ़ादरलैंड अमेरिका में इसे न केवल दिखाया जा रहा है बल्कि इसे ऑस्कर पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था।
जनवरी 2024 में इज़रायली सेना की गोलियों की शिकार हुई ग़ज़ा की 6 साल की बच्ची हिन्द रजब और उसे बचाने की कोशिश कर रहे रेड क्रिसेंट के वॉलंटियर्स की कहानी को एक डॉक्युड्रामा के तौर पर पेश करने वाली यह फ़िल्म दर्शकों को निःशब्द और निस्तब्ध कर देती है। डेढ़ घंटे की पूरी फ़िल्म दो कमरों में फ़ोन पर बात कर रहे 4-5 किरदारों और हिन्द रजब की रिकॉर्डेड आवाज़ पर केन्द्रित है लेकिन आप ज़रा देर के लिए भी सीट से उठ नहीं सकते। फ़िल्म इस क़दर झकझोर देती है कि ख़त्म होने के बाद काफ़ी देर तक कोई कुछ बोल नहीं सका।
फ़िल्म में कहीं इज़रायल के बारे में सीधे कुछ नहीं कहा गया है लेकिन यह आपको ग़ज़ा में इज़रायली बर्बरता के प्रति गहरे आक्रोश से भर देती है। पूरी फ़िल्म वेस्ट बैंक के रामल्ला शहर में स्थित फ़िलिस्तीनी रेड क्रिसेंट के इमरजेंसी सेंटर में चलती है। 29 जनवरी 2024 को, ग़ज़ा शहर के पश्चिमी हिस्से पर इज़राइली सेना के क़ब्ज़े के बाद वहाँ रहने वाले लोगों को जगह खाली करने के लिए कहा गया था। लगातार गोलीबारी के बीच जान बचाकर भाग रहे लोग मदद के लिए इमरजेंसी सेंटर में फ़ोन करते हैं।
एक वॉलंटियर उमर के पास छह साल की बच्ची हिन्द रजब का फ़ोन आता है – डरी-सहमी आवाज़ में वह बताती है कि वह कार में अकेली ज़िन्दा बची है। उसके परिवार के सभी लोग गोलियों से मारे गये हैं। अपनी साथी राना के साथ मिलकर, वह उस बच्ची को उस भयानक हालात से बचाने के लिए हर मुमकिन कोशिश करता है। एक बचाव दल पास में ही मौजूद है, लेकिन वे अपनी एम्बुलेंस लेकर सीधे वहाँ नहीं पहुँच सकते। इसके लिए इज़राइली सेना से पहले वहाँ तक जाने के रूट की मंज़ूरी और फिर जाने की इजाज़त मिलना ज़रूरी है। इसी कोशिश में घंटों बीतते जाते हैं – हिन्द अपने परिजनों के मृत शरीरों के नीचे दबी हुई है और उनके ख़ून से भीगी है।
आख़िरकार जब इजाज़त मिलती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। हिन्द रजब के साथ कॉल की वॉयस रिकॉर्डिंग उस घटना के कुछ ही समय बाद वायरल हो गई थी। उस रिकॉर्डिंग और घटनाओं के वास्तविक फ़ुटेज के साथ इमरजेंसी सेंटर के वॉलंटियर्स के अभिनीत किए गए दृश्यों को निर्देशक काउथर बेन-हानिया ने बहुत प्रभावी ढंग से मिलाया है।
बेन-हानिया ने इसके बारे में कहा है : “हिंसा से भरी तस्वीरें हमारी स्क्रीन्स, हमारी टाइमलाइन्स और हमारे फ़ोन्स पर हर जगह मौजूद हैं। लेकिन मैं उस चीज़ को सामने लाना चाहती थी, जो आम तौर पर दूर बैठे हम लोग नहीं देख पाते। वह 'अदृश्य' पहलू : भयावह इन्तज़ार, डर, और मदद नहीं पहुँचने पर छा जाने वाला असहनीय सन्नाटा। कभी-कभी, जो चीज़ें हमें दिखाई नहीं देतीं, वे उन चीज़ों से कहीं ज़्यादा दिल दहला देने वाली होती हैं जो हमें दिखाई देती हैं। इस फ़िल्म का मूल-भाव बहुत ही सीधा-सादा है, लेकिन उसे सहन कर पाना बेहद मुश्किल है। मैं ऐसी दुनिया को स्वीकार नहीं कर सकती, जहाँ कोई बच्चा मदद के लिए पुकारे और कोई भी उसकी मदद न कर पाये। वह दर्द, वह नाकामी – हम सभी की साझा नाकामी है।”
फ़िल्म के बाद हुई बातचीत में इन पहलुओं पर चर्चा के साथ ही फ़िलिस्तीन की आज़ादी के संघर्ष, भारत में पिछले डेढ़ दशक के दौरान इज़रायल के साथ सरकार के बदले संबंधों और लगातार प्रॉपेगैंडा के कारण फ़िलिस्तीन के प्रति समाज के बड़े हिस्से में फैले झूठ और नफ़रत पर भी चर्चा हुई। पश्चिम एशिया में जारी जंग, साम्राज्यवादी नीतियों और समाज में फैले इस्लामोफ़ोबिया आदि पर भी बातें हुईं।
लखनऊ विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय क़ानून के प्रोफ़ेसर भानु प्रताप ने विस्तार से बताया कि किस तरह अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की ग़लत व्याख्या के ज़रिए इज़रायली राज्य के गठन की ज़मीन तैयार की गई और फ़िलिस्तीन को राज्य के दर्जे से वंचित किया गया।
सत्यम, असग़र मेहदी, ज्योति नन्दा, यशू, फ़रज़ाना मेहदी, ऋषिका, नदीम साहिल, उज्ज्वल सेठ, तथागत, संस्कृति पाल, आकाश शर्मा, तनवीर आलम, पुनीत, लालचन्द्र, रामविलास, सन्दीप नेगी, रुचि साहू, भूमिका बडोला, मो. अहबाब, प्रार्थना, विकास, राजू आदि ने भी बातचीत में हिस्सा लिया। फ़िलिस्तीन और इज़रायल के इतिहास और राजनीति से जुड़े सवालों पर आगे अलग से विस्तृत चर्चा रखे जाने पर भी सहमति बनी।
इस मौक़े पर ‘जनचेतना’ की ओर से फ़िलिस्तीन के मसले पर कुछ चुनिन्दा किताबों, लेखों और पर्चों की प्रदर्शनी भी लगाई गई थी।
इस फ़िल्म के हिन्दी सबटाइटल्स नहीं तैयार किये जा सके थे क्योंकि अंग्रेज़ी सबटाइटल्स की अलग से फ़ाइल मिलना सम्भव नहीं हुआ। अंग्रेज़ी सबटाइटल्स वीडियो में ही एंबेड किये गये हैं। हालाँकि इसकी कमी किसी दर्शक को खटकी नहीं। कल हम इसे ‘लखनऊ सिनेफ़ाइल्स’ के टेलीग्राम चैनल पर भी उपलब्ध करा देंगे।